जीजा ने जंगल में किया मेरी गांड का मंगल

इलाहबाद के होटल में एक ही रात में तीन बार मेरी गाण्ड मारने के बाद बड़े जीजाजी को एक सप्ताह तक फ़िर मेरी गाण्ड मारने का मौका ना मिल सका। उन्होंने कई बार मौका निकाला पर वह सफ़ल नहीं हो सके।

हालांकि मुझे गाण्ड मराने में आनन्द तो आया था परन्तु मुझे यह सब अच्छा नहीं लगा था। मन में डर भी था। सेक्स के बारे में मुझे उस समय कोई जानकारी भी नही थी । पहली बार मैंने मुत्तु (लण्ड) और गांड का ऐसा उपयोग होते देखा था। गाण्ड के छेद में लण्ड घुसने पर मुझे बड़े जोर का दर्द होता था तथा टायलेट में भी तकलीफ होती थी इसलिए गांड मराने में मजा आने के बाद भी मैं बड़े जीजाजी से बच के रहता था पर वह कहाँ मानने वाले थे। उन्होंने मौका निकाल ही लिया।

जंगल की सैर कराने के बहाने वह मुझे अपने साथ जंगल ले आए। सुबह सुबह वह और मैं जीप से जंगल के लिए निकले। करीब चार घंटे के सफर के बाद हम जंगल में उनकी ड्यूटी-पॉइंट पर पहुँचे। यह बड़ी ही खूबसूरत जगह थी। बीच जंगल में उनके रहने के लिए दो वृक्षो पर जमीन से करीब दस फीट ऊपर लकड़ी का दो कमरों वाला मकान बना था, जिसमें उपयोग के लिए सभी सामान था। बड़े जीजाजी जब भी जंगल में रहते वह इसी काष्ठ-घर में रुकते थे।

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उन्होंने अपनी सेवा के लिए दो छोकरे रख रखे थे उनमें से एक नेपाली था तथा एक आदिवासी, लेकिन दोनों ही चिकने और आकर्षक थे। नेपाली का नाम शिव था तथा आदिवासी लड़के का नम शायद मथारू था। उनकी चाल ढाल देख कर ही मुझे लगा कि जीजाजी ने गांड मारने के लिए ही इन्हें रख रखा है।

जंगल में पहुँच कर जीजाजी ने दोनों से खाने की व्यवस्था करने को कहा तथा मुझे लेकर वह ऊपर कमरे में आ गए। आते ही वह बोले – योगेश तुम नहा कर तैयार हो जाओ।

मैं नहाने के लिए बाथरूम में चला गया पर वहां दरवाजा नहीं था, सिर्फ़ एक परदा लगा था। मैं नहाने लगा, तभी जीजाजी भी वहां आ गए। उन्होंने मुझे पकड़ कर मेरी चड्डी उतार दी तथा मेरी पीठ, जांघ और गाण्ड पर साबुन मलने लगे। बीच बीच में वह मेरी मुत्तु को भी सहला देते तथा मेरे गाण्ड के छेद में भी साबुन भर कर उंगली डाल देते।

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मुंह पर साबुन लगा होने के कारण मेरी आँखें बंद थी। मैंने महसूस किया कि जीजाजी भी पूरी तरह नंगे हैं तथा मेरा हाथ पकड़ कर वह अपने लण्ड को सहला रहे हैं। मैंने पहली बार उनका लण्ड पकड़ा था। उसकी लम्बाई और मोटापन महसूस कर मैं डर सा गया कि इतना बड़ा और मोटा लण्ड कैसे मेरे छोटे से छेद में घुस जाता है।

जब उनका लण्ड पूरे जोश में आ गया तो उन्होंने थोड़ा और साबुन मेरे गाण्ड के छेद में लगा दिया तथा अपने लण्ड को मेरे छेद से टिका दिया।

उन्होंने एक जोर का धक्का दिया लण्ड का सुपारा अब मेरी गांड के अन्दर था। दर्द के मारे मेरी चीख निकल गई। बेरहम जीजाजी ने मेरी गाण्ड को थोड़ा सा दबाया और दोनों दोनों फांको को फैला कर छेद में अपना पूरा लण्ड घुसेड़ दिया तथा धीरे धीरे धक्के लगाने लगे।

थोड़े दर्द के बाद अब मुझे भी मजा आने लगा। जीजाजी पूरे जोश में थे। मुझे घोड़ा बनाकर लगातार लण्ड अन्दर बाहर कर रहे थे। बाथरूम फच फच की आवाज़ से गूँज रहा था। १५ मिनट बाद उन्होंने पिचकारी मेरे गाण्ड के छेद में ही छोड़ दी। उन्होंने ही मेरी गाण्ड साफ की तथा नहलाया। नहाने के बाद उन्होंने पूछा – योगी मजा आया। में शरमा गया, कोई जवाब नही दिया।

इसी बीच शिव और मथारू ने खाना तैयार कर लिया था। खाना खाने के बाद जीजाजी ने थोड़ी देर आराम किया। मुझे भी अपने पास लिटा कर मेरे लण्ड को सहलाया तथा उसे मसला भी। मेरे गाण्ड के छेद में उंगली डाली, मुझे मजा तो आ रहा था पर न जाने क्यूँ यह सब मुझे बहुत अच्छा नहीं लगा। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर अपने लण्ड पर रख दिया। वह पूरी तरह तन्नाया हुआ था।

उन्होंने मेरे मुत्तु को मसला तथा फिर मुझे तिरछा कर मेरी चड्डी नीच खिसका दी और मेरे गाण्ड के छेद में उंगली करने लगे। फिर उन्होंने कोई तेल मेरे छेद पर मला तथा अपने लण्ड पर भी लगाया। तिरछा लेटे होने के कारण वह मेरी गांड में अपना लण्ड नहीं घुसा पा रहे थे। उन्होंने मुझे पलट कर उल्टा कर दिया तथा वह मेरी टांगों के बीच में आकर बैठ गए। मेरे दोनों गाण्ड को मसला तथा उन्हें फैला कर मेरी गांड के छेद में एक जोर का धक्का मार कर एक ही बार में पूरा का पूरा लण्ड घुसेड़ दिया।

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मैं दर्द से बिलबिला उठा। मेरी चीख निकल गई पर वह नहीं माने। वह लगातार धक्के पर धक्के मरे जा रहे थे। मुझे मजा तो आने लगा पर मेरे आंसू भी भी निकले। करीब १५ मिनट बाद वह झड़ गए और सारे का सारा रस मेरे गाण्ड के छेद में ही निकाल दिया।

जंगल में जीजाजी का चार दिन रुकने का प्रोग्राम था। दो घंटो में ही उन्होंने दो बार मेरी गांड मार ली। मैंने मन ही मन हिसाब लगाया कि यदि जीजाजी ने इसी रफ्तार से मेरी गांड मारी तो मैं तो मर ही जाऊंगा। उनका मोटा लण्ड घुसते समय बड़ा दर्द देता था तथा मेरी गांड से खून भी निकाल आता था। लेकिन मेरे पास कोई चारा नहीं था चुपचाप गांड मराते रहने के।

पहले ही दिन संध्या समय तक जीजाजी ने एक बार मेरी गांड और मारी तब वह मुझे जंगल की सैर कराने ले गए। जंगल काफी खूबसूरत था। प्राकृतिक सुन्दरता, हिरण, बारहसिंगे, नीलगाय और मोर देख कर मन खुश हो गया। लौटते लौटते रात के आठ बज गए। खाना तैयार था। हमने खाना खाया और मैं सोने के लिए लेट गया। मैं बहुत थक भी गया था। पर जीजाजी तो मेरी गांड का भुरता बनाने पर तुले थे। उस रात उन्होंने चार बार और मेरी गांड मारी। मेरी गांड का छेद फूल कर कुप्पा हो गया। पर मैं कर भी क्या सकता था। जंगल में मेरी सुनने वाला भी कोई नहीं था। वैसे भी मैं यह सब किसी से कह भी नहीं सकता था।

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